According tp the Hindu rituals one of them is Shraddh (श्राद्ध) .Late Bankim Chandra tells through his wife Smt Magnmayi Devi that in the time of Shraddha Paksha(श्राद्ध पक्ष ) he comes where his body was brought to ground after last breathing of death.He accepts whatever he was offered .
He always comes on the Earth due to attachment of his relatives and place.
Now further......... fearfulness to fearlessness
.....''.जिधर दृष्टी जाती उधर देख पड़ता है देव गण आत्मा गण योगिनी वेश में स्त्रियाँ सभी धर्म चर्चा कर रहे है।सब के मुख पर स्वर्गीय आलोक देख पडता है ,शांति से सबका मुख प्रसन्न है ।यह सब देख कर आनंद लाभ होता है ।यह जान कर तुम लोगो को भी सुख होगा ।पहले समझते थे की मरने के बाद किसी अज्ञात देश में चले जाना पड़ता है ।जहाँ किसी से भेंट नहीं होगी ।यह सब सोच कर मृत्यु से ड र जाता था ।अब देखता हु पृथ्वी की अपेक्षा यह अनंत धाम कितना अधिक शांति मय है ।यहाँ अपने बंधू बांधव आत्मीय जनो से कितना अधिक आदर पता हूँ ।यहाँ अन्धकार नहीं है सब कुछ आलोकमय है ।देहावस्था में वैकुण्ठ पूरी का वर्णन पढ़ा था ।वह अब सत्य ही देखने में आरहा है ।चारो और जो भवन .वृक्ष पक्षी मनुश्यादी दिखाई दे रहे है -सभी ज्योतिर्मय है ।जहाँ तक दृष्टी जाती है ,प्र काश ही प्रकाश है ।यहाँ आलोक का राज्य है ।जब तक कोई इसे देखता नहीं तब तक कोई इस पर विस्वाश नहीं कर सकेगा ।
'जब मुझ को बाहर निकाला गया था तब सब का मुख विषाद मय था ।सतीश के मुख पर दृष्टी डालने पर पता चला की वे काय मन वाक्य से मेरे आत्मा कल्याण के लिए अपने गुरुदेव तथा बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना कर रहे थे जिससे में उन्नति मार्ग में शिग्र उठ सकू ।उनका हर्ष विषाद से भरा मुख देख कर मेरे प्राणों ने शांति की अनुभूति की और उसी स्थान पर खड़ा हो कर उनको आशीर्वाद दिया की उन्हें सुद्बुद्धि लाभ हो जाये ।
' जब में समझ गया की सत्य ही मेरे जीने की कोई आशा नहीं है ,तब मेरे मन में भीषण भय हुवा ।अपनी स्त्री को गले लगा कर कहा -'में मर रहा हु ,ऊपर से उन लोगो को बुलाओ (कोठी पर से )।भय लग रहा है ।' स्त्री ने कहा -"भय क्या है भगवान् को पुकारो ।वो ही शांति देने वाले है ।'' तब उनके चक्षु में आसू देख दर मेने पोछ दिया ।मेने सोचा की जब उनकी आँखों में भी जल आगया है तो मृत्यु निश्चित है।' आब तक मेरी आशा थी की बच जायेंगे ।अब देख रहा हु की सब मिथ्या है ।स्त्री पुत्रदिको सभी को छोड़ कर जाना होगा ।जीवन में तो कोई पुण्य कर्म किया नहीं ।अब मेरा उद्धार केसे होगा ? यह सब चिंता करते करते में हताश हो गया । अकस्मात् एक क्षीण आशा मन में उदित हुई ।मनो कोई कह रहा है - "तुम्हारा समय समाप्त हो गया ।अब सब छोड़ कर जाना हो गा .परन्तु तुम दुखी क्यों होते हो ?ये लोग तुम्हारे कोन है ?कोई कुछ नहीं है ।अब तुम परलोक में चलो ।वहां जाकर देखोगे ,तुम्हारे आत्मीय ज्योतिर्मय रूप में है ।यहाँ तुम कितना कष्ट पारहे हो ?वहां शांति ही शांति है ।मरने में कोई ड र नहीं है \वहा देखोगे ,मृत्यु में कितनी शांति है ।" ये शब्द मेने देव वाणी की भांति सुने ,इससे भरोसा हुवा ।दुर्बल देह में बल आगया ।अब अनुभव करता हु की वस्तुतः मृत्यु से ही मुक्ति मिली है ।
' रोग शय्या पर पड़े पड़े कभी कभी सोचता था की इस कठिन रोग केंसर से कोई बचता नहीं \अब हमारी मृत्यु का दिन दूर नहीं है । परन्तु मृत्यु शब्द सुनते ही मन भयभीत हो जता था ।बाबा विश्वनाथ !बाबा विस्वनाथ !कह कह कर रोता था ।उन्होंने मेरा कातर क्रंदन सुनकर अपनी गोद में उठा लिया ,और सभी यंत्रनाओ से मुक्ति देदी ।
.' में लोक लय से काफी दूर हूँ ।परन्तु संसार का आकर्षण एक कम से छूटा नहीं ।इसलिए पृथ्वी पर नित्य दो बार जाना पड़ता है ।बाल बच्चों का मोह एकदम कटा नहीं है ।परन्तु इस शांति भूमि को छोड़ कर आने में अस्थिर हो जाता हु ।कब इस अस्थिरता से मुक्ति मिलेगी ? भगवान् जाने ।
मृत्यु के बाद भय से अभय की और
He always comes on the Earth due to attachment of his relatives and place.
Now further......... fearfulness to fearlessness
.....''.जिधर दृष्टी जाती उधर देख पड़ता है देव गण आत्मा गण योगिनी वेश में स्त्रियाँ सभी धर्म चर्चा कर रहे है।सब के मुख पर स्वर्गीय आलोक देख पडता है ,शांति से सबका मुख प्रसन्न है ।यह सब देख कर आनंद लाभ होता है ।यह जान कर तुम लोगो को भी सुख होगा ।पहले समझते थे की मरने के बाद किसी अज्ञात देश में चले जाना पड़ता है ।जहाँ किसी से भेंट नहीं होगी ।यह सब सोच कर मृत्यु से ड र जाता था ।अब देखता हु पृथ्वी की अपेक्षा यह अनंत धाम कितना अधिक शांति मय है ।यहाँ अपने बंधू बांधव आत्मीय जनो से कितना अधिक आदर पता हूँ ।यहाँ अन्धकार नहीं है सब कुछ आलोकमय है ।देहावस्था में वैकुण्ठ पूरी का वर्णन पढ़ा था ।वह अब सत्य ही देखने में आरहा है ।चारो और जो भवन .वृक्ष पक्षी मनुश्यादी दिखाई दे रहे है -सभी ज्योतिर्मय है ।जहाँ तक दृष्टी जाती है ,प्र काश ही प्रकाश है ।यहाँ आलोक का राज्य है ।जब तक कोई इसे देखता नहीं तब तक कोई इस पर विस्वाश नहीं कर सकेगा ।
'जब मुझ को बाहर निकाला गया था तब सब का मुख विषाद मय था ।सतीश के मुख पर दृष्टी डालने पर पता चला की वे काय मन वाक्य से मेरे आत्मा कल्याण के लिए अपने गुरुदेव तथा बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना कर रहे थे जिससे में उन्नति मार्ग में शिग्र उठ सकू ।उनका हर्ष विषाद से भरा मुख देख कर मेरे प्राणों ने शांति की अनुभूति की और उसी स्थान पर खड़ा हो कर उनको आशीर्वाद दिया की उन्हें सुद्बुद्धि लाभ हो जाये ।
' जब में समझ गया की सत्य ही मेरे जीने की कोई आशा नहीं है ,तब मेरे मन में भीषण भय हुवा ।अपनी स्त्री को गले लगा कर कहा -'में मर रहा हु ,ऊपर से उन लोगो को बुलाओ (कोठी पर से )।भय लग रहा है ।' स्त्री ने कहा -"भय क्या है भगवान् को पुकारो ।वो ही शांति देने वाले है ।'' तब उनके चक्षु में आसू देख दर मेने पोछ दिया ।मेने सोचा की जब उनकी आँखों में भी जल आगया है तो मृत्यु निश्चित है।' आब तक मेरी आशा थी की बच जायेंगे ।अब देख रहा हु की सब मिथ्या है ।स्त्री पुत्रदिको सभी को छोड़ कर जाना होगा ।जीवन में तो कोई पुण्य कर्म किया नहीं ।अब मेरा उद्धार केसे होगा ? यह सब चिंता करते करते में हताश हो गया । अकस्मात् एक क्षीण आशा मन में उदित हुई ।मनो कोई कह रहा है - "तुम्हारा समय समाप्त हो गया ।अब सब छोड़ कर जाना हो गा .परन्तु तुम दुखी क्यों होते हो ?ये लोग तुम्हारे कोन है ?कोई कुछ नहीं है ।अब तुम परलोक में चलो ।वहां जाकर देखोगे ,तुम्हारे आत्मीय ज्योतिर्मय रूप में है ।यहाँ तुम कितना कष्ट पारहे हो ?वहां शांति ही शांति है ।मरने में कोई ड र नहीं है \वहा देखोगे ,मृत्यु में कितनी शांति है ।" ये शब्द मेने देव वाणी की भांति सुने ,इससे भरोसा हुवा ।दुर्बल देह में बल आगया ।अब अनुभव करता हु की वस्तुतः मृत्यु से ही मुक्ति मिली है ।
' रोग शय्या पर पड़े पड़े कभी कभी सोचता था की इस कठिन रोग केंसर से कोई बचता नहीं \अब हमारी मृत्यु का दिन दूर नहीं है । परन्तु मृत्यु शब्द सुनते ही मन भयभीत हो जता था ।बाबा विश्वनाथ !बाबा विस्वनाथ !कह कह कर रोता था ।उन्होंने मेरा कातर क्रंदन सुनकर अपनी गोद में उठा लिया ,और सभी यंत्रनाओ से मुक्ति देदी ।
.' में लोक लय से काफी दूर हूँ ।परन्तु संसार का आकर्षण एक कम से छूटा नहीं ।इसलिए पृथ्वी पर नित्य दो बार जाना पड़ता है ।बाल बच्चों का मोह एकदम कटा नहीं है ।परन्तु इस शांति भूमि को छोड़ कर आने में अस्थिर हो जाता हु ।कब इस अस्थिरता से मुक्ति मिलेगी ? भगवान् जाने ।
मृत्यु के बाद भय से अभय की और
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